झारखंड में एग्राे टूरिज्म का नया ट्रेंड, रांची के दो ट्राइबल युवा रोज फार्मिंग(Rose Farming) के साथ साथ एग्रो टूरिज्म(Agro tourism) को दे रहे बढ़ावा

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छुट्टियाें के बीच खेती करने के तरीके सीखने के साथ, खेत-खलिहान में समय बिताने का बेहतरीन माैका

गांव की मिट्टी, खेत-खलिहान, फार्मिंग के बीच छुट्टियां बिताने का इरादा है ताे चले आईए रांची क्याेंकि यहां आप ले सकते हैं बिल्कुल अलग एग्राे टूरिज्म का मजा। रांची से खूंटी जाने वाले रास्ते में, बिरसा चौक से लगभग 24 किलोमीटर दूर शहर के दो ट्राइबल युवा कुमार अभिषेक उरांव व डॉ. मनीषा उरांव एग्रो टूरिज्म को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। नाम द ओपन फील्ड रखा गया है। यह फार्म लगभग दो एकड़ में फैला हुआ है। इस फार्म में रोज फार्मिंग के अलावा सीजनल सब्जी व फल भी लगाए गए हैं।

फार्मिंग की बारीकियां को देख सकते हैं
द ओपन फील्ड में रोज फार्मिंग व अन्य सब्जियों व फलों की ऑर्गेनिक फार्मिंग को देख सकते हैं। हर वीकेंड इसकी व्यवस्था की गई है। जहां पर फार्मिंग की बारीकियों से रूबरू हो सकते हैं। समय व्यतीत कर सकते हैं। कैंपिंग कर सकते हैं। साथ ही ट्राइबल फूड कुजीन का भी आनंद ले सकते हैं। इसके लिए यहां मिट्टी व बांस से घर बनाया गया है। इसके अलावा मिट्टी के सामान बनाने का वर्कशॉप भी चलाया जा रहा है। कुमार अभिषेक ने बताया कि आगे फोटोग्राफी वर्कशॉप का भी आयोजन किया जाएगा। जहां शहर के लोग ग्रामीण परिवेश में फोटोग्राफी का आनंद ले सकेंगे।

गुलाब की खेती से हुई शुरुआत
कुमार अभिषेक उरांव ने बताया कि 2018 के अंत में इस फार्म की शुरुआत की गई थी। जिसके तहत दो एकड़ जमीन पर गुलाब के पौधे की खेती शुरू की। शुरुआती समय में मार्केट में गुलाब के फुल मुहैया कराए। फिर बाद में गांव के लोगों के साथ मिल कर उसे प्रोसेस कर गुलाब जल व साबुन बनाने का काम शुरु किया। इसके साथ ही अब इसमें एग्रो टूरिज्म को भी जोड़ा गया है। कुमार अभिषेक उरांव रेडियो जॉकी के रूप में भी काम कर चुके हैं। उन्होंने सिंबॉयसिस पुणे से एमबीए किया है। वहीं उनकी पार्टनर डॉ. मनीषा उरांव डेंटिस्ट है। वह अपना क्लिनिक चलाने के साथ साथ फार्म का काम भी देखती हैं।

ट्रेडिशनल तरीके से बनाते हैं रोज वाटर
कुमार अभिषेक ने बताया की उनके यहां डच रोज के 6 अलग-अलग कलर हैं। प्लांटेशन के लिए जहां साइंटिफिक ताैर तरीकों को अपनाते हैं। वहीं प्रोसेस करने के लिए ट्रेडिशनल तरीकों को अपना रहे हैं। आग जलाने के लिए गोइठा का इस्तेमाल करते हैं, वहीं बर्तन भी मिट्टी के इस्तेमाल करते हैं। यहां से आसपास के ग्रामीणों को भी रोजगार मिल रहा है।

offbeatbuzz

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