रांची के दो युवाओं ने शुरू किया इंडोनेशिया के बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन

रांची के दो युवाओं ने शुरू किया इंडोनेशिया के बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन
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– 24 जियो मेंब्रेन टैंक में एक लाख मछलियाें का उत्पादन कर रहे हैं
– 4 डायमीटर का 24 जियो मेंब्रेन टैंक का निर्माण किया
– एक जियाे मेंब्रेन टैंक से औसतन 300 केजी का हाे सकता है प्रोडक्सन
– 30 हजार गिफ्ट तेलापिया व 80 हजार पाेंगास मछली का कर रहे उत्पादन

रांची के दो युवाओं ने मिल कर इंडोनेशिया में मछली पालन के लिए प्रयोग की जाने वाली बायोफ्लॉक तकनीक से रांची में मछली उत्पादन का काम शुरू किया है। इस तकनीक के तहत जियाे मेंब्रेन टैंक में मछली का उत्पादन किया जाता है। निशांत कुमार व अनूप कुमार रजक ने मिल कर अगस्त 2019 में इसे शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने केन्द्रीय मत्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुंबई के क्षेत्रीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, मोतीपुर के वैज्ञानिक डॉ. मोहम्मद अक्लाकुर से ट्रेनिंग ली। साथ ही वैज्ञानिक डॉ. मोहम्मद अक्लाकुर उन्हें तकनीकी सहयोग भी दे रहे हैं। निशांत व अनूप इंडोनेशिया भी जा कर इस तकनीक की बारीकियों से रूबरू हुए। निशांत कुमार की स्कूलिंग कैरली, ग्रेजुएशन संत जेवियर्स कॉलेज व एमबीए बंगलौर से हुई है। वहीं अनूप कुमार रजक ने सेंट्रल ऐकेडमी स्कूल से स्कूलिंग व संत जेवियर्स कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है।

निशांत कुमार व अनूप कुमार रजक

4 डायमीटर के 24 जियाे मेंब्रेन टैंक का निर्माण कराया

अनूप कुमार ने बताया कि बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन करने के लिए सबसे पहले 24 जियाे मेंब्रेन टैंक का निर्माण करवाया। एक टैंक 4 डायमीटर का है। जिससे 5-6 महीने में 300 केजी तक मछली उत्पादन किया जा सकता है। इस विधि से साल भर में दो बार हार्वेस्टिंग किया जा सकता है। एक जियाे मेंब्रेन टैंक के निर्माण में 30 से 35 हजार रुपए तक का खर्च आता है।

टैंक में मछली को डालने से पहले तैयार करते हैं बेक्टीरिया की कॉलाेनी

इस तकनीक में मछलियों को एक टैंक में डालने से पहले पानी काे सात दिनों तक प्रोसेस करते हैं। ताकि मछलियों के लिए नेचुरल वातावरण बना रहे। इसके लिए पानी में बेक्टीरिया की कॉलोनी तैयार करते हैं। जिसे मछली खाते हैं वो मछली के लिए प्रोटीन के रूप में होते हैं। वहीं मछली का जो भी वेस्ट होता है उसे बेक्टीरिया ग्रहण करते हैं।

24 घंटे टैंक में होता है ऑक्सीजन का प्रवाह

एक जियाे मेंब्रेन टैंक के पानी को मछली के अनुकूल तैयार करने के लिए टैंक में फ्रेश वाटर, सॉल्ट, प्राेबायाेटिक पाउडर, मीठा आदि का इस्तेमाल करते हैं। इसके साथ ही 24 घंटे ऑक्सीजन का प्रवाह किया जाता है। इस प्रोसेस में सात दिन लग जाते हैं। जब पूरी तरह से पानी तैयार हो जाता है तो इसमें मछलियों के बीज को पानी में डाल दिया जाता है।

इस तकनीक से लाभ

निशांत बताते हैं इसमें फायदा के लिए सही प्रकार के टेक्नीक की जरूरत होती है। इससे फिशरी को इंडस्‍ट्री के रूप में तैयार किया जा सकता है। इसे आगे इको टूरिज्म के रूप में डेवलप करने का लक्ष्य है। इस तकनीक से छोटे जगह पर भी ज्यादा से ज्यादा मछली का उत्पादन किया जा सकता है। अच्छी तरह से सुपरवाइज किया जा सकता है। चोरी का डर नहीं होता है। जरूरत पड़ने पर टैंक को एक जगह से दूसरी जगह भी ले जाया जा सकता है। इसे हॉबी की तरह भी छोटे से जगह में शुरू किया जा सकता है।

प्रोपर ट्रेनिंग की होती है आवश्यकता

केन्द्रीय मत्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुंबई के क्षेत्रीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, मोतीपुर के वैज्ञानिक डॉ. मोहम्मद अक्लाकुर ने बताया कि बायाेफ्लॉक टेक्नोलॉजी सघन मछली पालन की विधि है। इस विधि से मछली पालन के लिए प्रॉपर ट्रेनिंग की जरूरत होती है। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से उत्पादन का काम कर सकते हैं। अगर सही तरीके से ट्रेनिंग न ली जाए तो बहुत सी समस्या आ सकती है। इसकी ट्रेनिंग केंद्रीय संस्थानों से ले सकते हैं। जिसमें केन्द्रीय मत्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुंबई, खारा जल अनुसंधान केंद्र चेन्नई, केंद्रीय मीठा जल अनुसंधान केंद्र भुवनेश्वर, सिफरी कोलकाता आदि शामिल हैं।

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